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  • स्वच्छ भारत अभियान गया कचरे की पेटी में!

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    पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में यह विचार था की मैं किसी ऐसी बात पर लिखूं जिस से हर एक इंसान जुड़ा हुआ हो! कोई ऐसी बात जो हम सभी के आस-पास है और जो हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का न सिर्फ एक हिस्सा हो बल्कि जिसके बड़े और दूरगामी परिणाम हों। आज हमारे प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी ने अपने #ManKiBaat में मुझे वो बात दे ही दी। दोस्तों, वो बात है – सफाई/स्वछता की!

    “स्वच्छ भारत अभियान” मोदीजी की एक बहुत ही महत्वकांशी अभियान है जो कि पिछले साल गाँधी जयंती यानि 2 अक्टूबर को शुरू किया गया था। मोदीजी ने 1 तीर से कम से कम 3 शिकार तो किये ही थे। कांग्रेस से गाँधी छीन लिए, AAP से झाड़ू छीन ली और जनता का दिल जीत लिया। निकल पड़ा हर कोई झाड़ू हात में लेकर और बड़ी भूरी-भूरी प्रसंशा हुई इस अभियान और मोदीजी की। हजारों सेल्फीली गयीं, करोड़ों ट्वीट पेले गए, सड़कों की हुई सफाई और सोशल-मीडिया पर गंद फैलाई गयी!

    खैर, कुछ दिन, हफ्ते और महीने बीत गए, जोश भी ठंडा पड गया और सफाई तो जैसी हमेशा से थी वैसी ही रही। आज मोदीजी ने फिर याद दिला दिया इसके बारे में और वैसे भी गाँधी जयंती आ रही है। मोदी-अनुयायी और सरकारी अमला फिर निकल पड़ेगा सफाई करने और अभियान को सफल सिद्ध करने में। उधर एंटी-मोदी लॉबी निकल पड़ेगी इसको fail साबित करने के लिए।

    आपको क्या लगता है क्या रहेगा इसका परिणाम? सोचो! थोड़ा सर खुजाओ, थोड़ा नज़र दौड़ाओ अपने आस-पास, जवाब मिल जायेगा। FAIL है जी FAIL!!! बहुत बड़ा फ्लॉप-शो! पर ये याद रखना ये जितनी बड़ी विफलता #BJP और #NarendraModi की है, उससे कई गुना बड़ी यह हमारी विफलता है! जी हाँ हमारी – यानी मेरी और आपकी! आओ बताऊँ कैसे।

    अब ये सफाई कोई नयी बात तो है नहीं। बचपन से ही हमको सिखाया और पढ़ाया जाता रहा है। हममे से जो स्कूल गए हनीं उनके तो पाठ्यक्रम का हिस्सा रही है स्वछता। नाखून समय से काटना, बाल ज्यादा न बढ़ाना, खाने से पहले हाथ धोना, कूड़ा dustbin में डालना इत्यादि तो हम 5 साल का होते-होते सीख ही लेते हैं। परिस्थिति, समय, समुदाय, जीवनशेली इत्यादि का भी प्रभाव रहता है हमारे “sense of cleanliness” पर। पर ऐसा लगता है कि हम भारतीय लोग कुछ ज्यादा ही गंदगी-प्रिय हैं! हमको फर्क नहीं पड़ता कि हम कहाँ से है, हमारी पारिवारिक, मानसिक, शेक्षिक प्रष्ठभूमि क्या है। हम तो जी सब के सब अपने-अपने हिसाब से गंदगी फ़ैलाने में लगे हुए हैं। हम इस कदर लिप्त हैं कि कोई PM, कोई सरकार, कोई न्यायालय और कोई इश्वर हमको नहीं बदल सकता। आप सोच रहे होगे कि ये क्या बकवास कर रहा है साला!? हैं ना? साला चू*या हो गया है। चलो आओ सिद्ध किए देता हूँ अपनी बकवास!

    • चलो शुरुआत घर से ही करते हैं। आपने देखा होगा कि हमारे घर की स्त्रियाँ कितनी तन्मयता और तत्परता से हमारे घरों की सफाई करतीं हैं। कैसे कमरों और रसोई से निकले हुए कचरे को एक जगह रख देतीं हैं। बड़े शहरों में जहां लोग सोसाइटीज, फ्लैट्स वगहरा में रहते हैं वहाँ अमूमन सफाई वाले आते हैं और हमारे घरों से निकले हुए कचरे को ले जाते हैं। पर कुछ छोटे शहरों में (और बड़े शहरों में बसे छोटी सोच वाले लोग) कचरा उठाने वाले को 30-40-50-100 रूपये बचने के लिए कचरा नहीं देते। ये लेते हैं एक पॉलिथीन और भर कर उसमे कूड़ा, फेंक देते हैं सड़क पर या पड़ोस में पड़े खली प्लाट में या फिर नाले/नाली में। और गौर से सोचेंगे तो पाएंगे कि ये तो हम में से 70% लोगों की कहानी है! हम क्यूँ करते हैं ऐसा?
    • घर में की सत्यनारायण की कथा और बाँट दिया प्रसाद प्लास्टिक के दोने में। रिश्तेदारों ने भी प्रसाद ग्रहण करके दोने सरका दिए अपनी-अपनी कुर्सी के नीचे और शाम को आपने इखट्टे करके बहा दिए नाली में। क्यूँ भाई? कर दिया न सत्यनारायण का सत्यानाश?
    • सड़क घेर कर कर दिया माता का जगराता और हलवाई बिठा कर बनवा लिया हलवा-चने का प्रसाद। स्टाल सजते ही टूट पड़ते हैं हजारों प्रसाद लेने वाले भक्त। बड़े ही स्वाद के साथ खाते हैं प्रसाद को और दोने को उधर ही सड़क पर आवारागर्दी करने के लिए छोड़ देते हैं। क्यूँ भाई? उस दोने को उठाने के लिए क्या देवीमाँ खुद बोलें आप से?
    • हवन की बची हुई राख, पूजा के सूखे हुए फूल और खंडित मूर्तियाँ हम लोग नदी में सिराते हैं। पर क्या आपने गौर किया है कि इनको हम एक बड़ी सी पॉलिथीन में 3-4 गाँठ लगा कर छोड़ देते हैं गंगा-यमुना में! डाल दिया अपने कर्मो का बवाल गंगाजी के गले! अरे क्यूँ करते हो ऐसा, भाई?
    • भाभीजी weekend मानाने चली तो जाती हैं लाजपत और सरोजिनी मार्किट। और वहां जाकर म़ोमोस या गोलगप्पे या समोसे न खाए तो मज़ा नहीं आता। पर कभी ये सोचा है कि खाने के बाद पेपर-प्लेट कहाँ छोड़ी? दिल्ली (या कोई और शहर) आपके बाप का है?
    • हम क्यूँ गुटका-खैनी खा कर पीक मारते फिरते हैं दुनिया भर में? अपने ड्राइंग-रूम का किनारा क्यूँ नहीं सजाते?
    • पॉलिथीन से पट कर हमरे शहरों के नाले/नाली जाम हो जाते हैं। और फिर जब बारिश में सड़क पर पानी भरता है, सड़क टूटती है तो हम सरकार को गली बकते हैं। जैसे हम बहुत पाक-साफ़ हैं?
    • सुसु लग रही है? अबे रोक ले बाइक कहीं भी, खींच दे चैन को नीचे और हो जा हल्का! ये हर लड़के की कहानी है जो बियर तो (बढ़िया वाली) मिलर पिएगा पर सुलभ शौचालय में मूतने के लिए 1 रुपया नहीं देगा। क्यूँ भाई, महंगी बियर से आये मूत को ऐसे ही बहा देगा?
    • ट्रेन में सफ़र करते हुए, लीं 10 रूपये की मूंगफली और लगा दिया छिलकों का अम्बर। लिया चिप्स का पैकेट या ठन्डे की बोतल और सरका दिया खाली पैकेट ट्रेन की खिड़की से बाहर! क्यूँ भाई, तुमको सुरेश प्रभु की मेहनत चौपट करने का पैसा मिलता है?
    • आप सिगरेट/बीड़ी पीते हो और जली हुई बीड़ी/सिगरेट के साथ-साथ उससे बनने वाले बलगम के सिक्के सड़क पर ही निकाल फेंकते हो? भूल गए आप सड़क पर चलने का टैक्स देते हो, उसको गन्दा करने का नहीं?
    • हम में से कितने अपने ऑफिस (चाहे सरकारी को या प्राइवेट) की अपने घर के बराबर देखभाल करते हैं? क्या आप करते हो? नहीं, तो क्यूँ नहीं? दिन के 8-10 घंटे हमारे उधर ही निकलते हैं, हमारी पहचान उधर ही बनती है और फिर भी हम ऑफिस के झीनों में, बाथरूम में थूकने से पहले एक बार नहीं सोचते। क्यूँ? क्या हम भूल जाते हैं कि हमारी रोटी-बोटी वह ऑफिस ही देता है?
    • हम पिकनिक मानाने जाते हैं तो क्यूँ पार्क में अपनी खुराक की निशानी छोड़ आते हैं? हम क्यूँ लाल-किले और ताजमहल पर अपना और कभी अपनी न हुई लड़की का नाम लिख देते हैं? वो हमारे बाप की जागीर है?
    • कभी अपने आस-पास के मूत्रालय को जाकर देखें, आपको वहाँ पर मूत्र के साथ-साथ मल भी मिलेगा। वो कौन बेवक़ूफ़ होगा जो मूत्रालय में हग जायेगा? ज़रा देखो इधर-उधर और सोचो!
    • क्यूँ हमारे बस-अड्डे, स्टेशन और सरकारी बिल्डिंग इतने गंदे रहते हैं? क्या मेरी और आपकी ज़िम्मेदारी कुछ भी नहीं? और अगर है तो क्या वो सिर्फ अपने घर तक सीमित है? अगर हम अपने घर के बहार की दुनिया साफ़ नहीं रख सकते तो हम उसको गन्दा किस हक से करते हैं?

    अब जब 10 दिन बाद गाँधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान पर राजनेतिक उठा-पटक हो तो अपनी सरकार और मोदीजी को 4 गाली बकने से पहले ज़रा अपना मुँह देख लेना शीशे में। हो सकता है थोड़ी सी शर्म आ जाये। आप कचरा को कचरा-पेटी में पहुंचा नहीं पाए, हाँ सवच्छ भारत आप ज़रूर पहुंचा देंगे।

    मैं चला बियर पीने। पर बोतल फैकुंगा नहीं! 😉

    PS: I don’t own the image that has been used in the blog. I give the owner of the image due credit.