Chapter: Food
तामसिक भोजन न करने वाले?
तामसिक भोजन करने वाले?
कभी न मांस खाने वाले?
रोज़ मांस खाने वाले?
सिर्फ अंडा खाने वाले?
मंगलवार को छोड़ मांस खाने वाले?
अपने देव को बलि अर्पित करने वाले?
विशिष्ठ आराधना वाले दिनों में मांस बनाने और खाने वाले?
विशिष्ठ आराधना वाले दिनों में फलाहार करने वाले?
विशिष्ठ आराधना वाले दिनों में निर्जला व्रत रखने वाले?
बलि को पूजा पद्धति मानने वाले?
बलि को घृणा से देखने वाले?
ऊपर लिखे कुछ प्रश्नों में से कुछ तो आपको सही और तार्किक लगेंगे, लेकिन कुछ बिलकुल ही गलत और अटपटे! कुछ से आप खुद को जुड़ा देख कर प्रसन्न हुए होंगे। तो कुछ को पढ़ कर मन थोड़ा कुपित भी हुआ होगा।
पर क्या ही करें? हमारी ‘हिन्दू’ होने की जो पहचान है, परिभाषा है वो है ही ऐसी! बहुत वृहद! बहुत विविध और विस्तृत! यहाँ मानने की, पूजने की, अनुसरण करने/न करने की पूरी छूट है। जो अच्छा लगे उसको आत्मसात कर लेने की और जो मन जो न भाये उसका परित्याग करने की। ये हमारे (हम हिन्दुओं, जैन, बौद्ध और सिख) के लिए समझना आसान होना चाहिए। सीधी सपाट सड़क पर चलने वाले (या यूं कहिये कि एक किताब को मानने वाले) को ये सब समझना बहुत ही मुश्किल और पीड़ादायक है। पर अगर हिन्दू होने के बाद भी आपको ऊपर कही गयी किसी भी बात से किसी भी तरह की आपत्ति है तो फिर हम मुश्किल में हैं। क्यों?
क्यूंकि ये जो विविधता है, यही हमारा मूल है। सही मायने में इसी ने हमको और हमारे धर्म को जीवित रखा है। विचार कीजिये कि पश्चिम से घोड़े पर सवार कोई आता है और बोलता है कि यहाँ रह रहे सभी को मेरी पूजा पद्धति ही माननी पड़ेगी और मेरे ईश्वर को ही पूजना पड़ेगा। अब इस कथन को पूरा करने के लिए ऐसा वो क्या करें कि लोग मान जाए? यहाँ न तो कोई ढांचा है जिसको तोड़ा जा सके, न कोई एकीकृत संस्था है जिसको खत्म किया जा सके और न ही कोई ऐसा गणमान्य व्यक्ति है जो पूरे समाज को एक साथ लेकर कार्य पूर्ण कर सके। अब एक-एक को पकड़ कर न तो कोई कलमा पढ़वा पाया और न ही कोई baptise कर पाया! ये विरोधाभास ही हमारी ढाल बना!
पर आज विविधता पर संकट खड़ा हुआ है। विधर्मी क्या सोच रहे हैं उसकी तो चिंता मुझे लेशमात्र भी नहीं है। मैं हमारे अपने द्वारा बनाये गए संकट की बात कर रहा हूँ। हम जड़ होते जा रहे हैं। विविधता को छोड़ रहे हैं, उस पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं और जो आज हमको ठीक लगता है सिरह उसको ही परम-सत्य मान रहे हैं।
सावन का महीना चल रहा है और मेरे गृह प्रदेश – उत्तर प्रदेश – में आहार और मांसाहार को लेकर काफी कुछ हो रहा है। होटल, ढकेल वालों को बोला जा रहा है कि वो प्रतिष्ठान के स्वामी और नौकरो के नाम इत्यादि को लिखे जिससे कि आने/खाने वाले को पता चल सके कि भोजन किसने बनाया है। एक बार को मान लेते हैं कि यह हमारे लिए ही कर रहे हैं। पर विवाह वाले भोज का क्या? क्या आपको पता होगा कि वो सजी हुई मेज़ पर रखी रबड़ी किसने बनाई थी? Cloud-Kitchen के माधयम से आने वाले भोजन का क्या? उस भोजन को लाने वाले का क्या? यह सब बनाने वाले और खाने वाले पर ही क्यों नहीं छोड़ देते हम लोग? जिसको खाना है वो खाये, जिसके हाथ का खाना है खाये! नहीं खाना तो अपने घर से बनवा कर लाये!
इसी कड़ी में अगली बात कुछ और ज़्यादा संवेदनशील है! मांसाहार! हम में से कुछ लोगों के लिए श्रावण मास अलग-अलग कारणों से से कई सारी रोक-टोक लेकर आता है। कई तरह का आहार प्रतिबंधित होता है। मीट उस श्रेणी में सबसे ऊपर आता है। पर जो खाते हैं उनका क्या? हम हिन्दुओं में भी कई ऐसे समुदाय हैं जिनके लिए मीट एक साधारण सी वास्तु है, सामान्य आहार का एक हिस्सा है। उनका क्या?
अब कश्मीर में जब घुटने तक बर्फ पड़ रही हो तब खाने की उपलब्धता बड़ी सीमित हो जाती रही होगी! कोई कहाँ से लाये शाक -सब्ज़ी? स्वतः ही भेड़ और मछली आहार का हिस्सा बन गयी। न सिर्फ हिस्सा बल्कि शिवरात्रि पर शिवजी को अर्पित होने वाला एक प्रमुख अंग भी बन गई।
कुछ ऐसा ही बंगाल और उत्तर पूर्व में भी हुआ। जब मछली है प्रचुरता में हो और बाढ़ में फसल, सब्ज़ी बर्बाद हो गई हो तो इंसान क्या करेगा? जो कुदरत देगी वही खायेगा। आज मछली सिर्फ मछली न होकर उनके जीवन, उत्सव, विवाहोत्सव का अभिन्न अंग है। जहाँ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ लोग नवदुर्गे के पर्व में बाल और दाढ़ी तक नहीं कटवाते, उपवास रखते हैं, वहीं बंगाल के लोग बकरे के मांस के व्यंजन बनवाते हैं और खाते हैं।
बंगाल के विपरीत दिशा में पड़ने वाले महाराष्ट्र और गोवा के कोंकण क्षेत्र की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। गणेशोत्सव के समय, गणपति के विराजमान होने के कुछ दिन पश्चात पार्वती को उनकी याद आती है। ऐसा माना जाता है कि वो जब गणेश से मिलने आती हैं तो वो अपने मायके आयी हैं और उनके मायके वाले (खासतौर पर कोली समुदाय के लोग) उनके स्वागत में उनकी मनपसंद भोजन की व्यवस्था करते हैं जिसमे प्रमुख होता है – केकड़ा, मछली और कुछ और माँसाहारी व्यंजन! राजस्थान से लेकर असम तक, नेपाल से लेकर मदुरै तक ऐसे कई विख्यात मंदिर हैं जिनमे कि बलि दी जाती है और प्रसाद स्वरुप मांस खाया भी जाता है।
ऐसे में कौन क्या खायेगा, क्यों खायेगा, क्यों नहीं खायेगा ये कोई क्यों तय करेगा? और किस क्षमता में करेगा?
चलो एक किस्सा भी सुन लीजिए। बात ये हुई कि गुजरात के राजपूत वर्ग के एक नौजवान ने व्यापार करने का सोचा। कुछ काम करने कि कोशिश भी करी पर सफलता हाथ नहीं मिली कहीं भी। फिर उसको मछली के व्यापार के बारे में पता चला। उसने देखा कि इस व्यापर में लिप्त लोगों को अच्छा मुनाफा हो रहा था। उसने भी कोशिश करी! घर परिवार, समाज सबका विरोध सहा और काम शुरू किया। उसको सफलता तो मिली पर एक (उसके समाज के हिसाब से) एक नीच काम करके पैसे कमाने वाले को समाज निरन्तत प्रताड़ित करता है। जब ज़्यादा न सुनी गयी उस व्यक्ति से तो उसने गुस्मे में इस्लाम क़ुबूल कर लिया। जानते हैं वो इंसान कौन था? पूंजा गोकुलदास मेघजी – मुहम्मद अली जिन्नाह के बाबा!
अब सोचिये कि अगर उनके समाज ने उनके काम को सिर्फ काम की ही तरह देखा होता तो क्या होता? और ये सब आज भी चल रहा है। कुछ वर्ष पहले एक रील वायरल हुई थी जिसमे एक होटल दिखाया हुआ था जिसमे मुर्गे लटके हुए थे तंदूर किये जाने के लिए और होटल की एक दिवार पर एक मंदिर भी टंगा हुआ था। रील बनाने वाले ने व्यर्थ ही बहुत भला बुरा कहा उस होटल वाले को और रील देखने वालों ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि हम आज भी आहार के नाम पर बटें हुए हैं।
और ये बंटवारा यही नहीं रुकता। कौन क्या खा रहा है उससे भी आपकी हैसियत तय होती है। बकरा, मछली, मुर्गा अलग हैं। सूअर वाले अलग हैं। खरगोश, जंगली मूसे खाने वाले और अलग श्रेणी में हैं। यह सब भेदभाव बहुत नया है और अनुचित है। आपको क्या लगता है पुराने ज़माने में शिकार क्या सिर्फ बाघों और शेरों का ही होता था? शेर और बाघ तो तो सिर्फ मनोरंजन के लिए मारे जाते थे। आहार के लिए हिरण, सूअर, बटेर इत्यादि मारे जाते थे। और सभी मारते थे। वर्गीकरण तो बहुत बाद में हुआ और गलत हुआ। यह समय है कि हम को अपनी विविध विचारधाराओं को अपनाना होगा, उनका सम्मान करना होगा! मांस खाना आपके लिए अपवित्र है, ठीक है!
जो खा रहा है वह भी ठीक है! न खाने वाला अपवित्र है, न न खाने वाला पवित्र! आप मांस नहीं देख सकते इसलिए आपको अलग जगह चाहिए – यह बात मानी जा सकती है। पर यह कहना कि मांस खाने वाले के साथ बैठ कर आपका धर्म भ्रष्ट हो गया बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी को छोटा बता कर हम खुद को बड़ा नहीं बनते, बड़ा हम अपने कर्मों से बनते है।
श्री राम!
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