कश्मीर की आज़ादी

वो च्च्चा था, ये था भाई,

वो बुड्ढी थी सबकी ताई।

उस जन्नत के फ़िरदौस का

कोई फूल था कोई था माली।

हर सुख दुःख इनका साझा था,

नून-चाय, वाज़वां साझा था।

नन्द ऋषि – लाल देद की औलादों को,

लड़ना – झगड़ना कहाँ आता था?

कश्मीरियत के वारिसों का आखिर,

खून भी तो साझा था।

झेलम – डल, हज़रतबल – खीरभवानी,

रेशा-रेशा, ज़र्रा-ज़र्रा साझा था।
एक मतवाले ने देखा सपना,

निज़ाम-ए-मुस्तफा लाने का।

अलसाई सी वादी में,

दावानल भड़काने का।
लाल चोक फिर लाल हुई

और क़त्ल कश्मीरियत का हुआ।

हुआ अनाथ कोई तो कोई बेवा हुई,

हुई क़ुबूल पाक की बददुआ।
राजतरंगिनी लिखने वालों ने

लिखी विनाश की बोलियाँ।

झेलम भी खून से लाल हुई,

जब चली आज़ादी की गोलियाँ।
आज़ादी के सपने में,

बच्चे – लड़के कुर्बान हुए।

जुड़े नहीं जो इस मजमे से,

हिन्दू हुए, गद्दार हुए।
मिला किसी को कुछ खास नहीं,

बस शमशान यहाँ गुलज़ार हुए।

और मुठ्ठी भर की ज़िद के आगे,

लाखोँ के घर बर्बाद हुए।

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